कुमाउनी भाषा का मानकीकरण क्यों जरूरी है ? -ललित तुलेरा



ललित तुलेरा
उप संपादक
पहरू - कुमाउनी मासिक पत्रिका, अल्मोड़ा (उत्तराखंड )
वाट्सऐप नं. -7055574602

त्तराखंडकि कुमाउनी भाषा लै भारतकि भाषाई बिबिधता में खास महत्व धरैं। इंडो-आर्यन भाषा परिवारकि यो भाषा सैकड़ों बर्षोंकि सांस्कृतिक और भाषाई परंपरा कैं समेरी छु, जो आज अस्तित्व और अस्मिताक मोड़ बै ठाड़ि छु। कुमाउनी भाषा कैं आजी तक भारत सरकार द्वारा क्वे आधिकारिक मान्यता नैं दिई जै रइ, और नैं ई यकैं संविधानकि आठूं अनुसूची में ठौर मिलि रई। यस में कुमाउनी भाषाक मानकीकरण भौत जरूड़ी और बखतकि डिमांड छु।

     कुमाउनी भाषा में कतुकै उप बोलि लै चलन में छन। यों सबै बोलि आपण-आपण इलाकन में मणी-मणी भिन्नता धरनी। य बिबिधताक कारण एक साझा, शिक्षण योग्य और प्रशासन योग्य रूप बिकसित नैं है सकि रइ। यै है अलावा वर्तनी और व्याकरणक क्वे सर्वमान्य मानक नि हुणक वजैल इमें साहित्य रचण, शिक्षा और तकनीकी प्रयोग में लै अड़ंग लागण लागि रौ। ठुलि पड़ताल यो लै छु कि कुमाउनीक सबै उप बोलियोंक अध्ययन आजि तक है नि सकि रय और सबै बोलियोंक समग्र शब्दकोश लै तय्यार करणकि ठुलि दरकार छु। ताकि कुमाउनीक शब्द भनारक सई मूल्यांकन है सको और भाषाक शब्दोंकि लै सटीक गणती है सको। 

कुमाउनीक मानकीकरण हुण पर कएक लोग सहमत नी देखीन पर भाषा विज्ञानकि सई समझ हो तो भाषाक मानकीकरणल फैदै-फैद हुनी। कुमाउनीक मानकीकरणल कुछेक फैद यो छन-

भाषा कैं संवारणै लिजी-
क्वे लै भाषा कैं नसीण है बचूणै लिजी पैंल लाप वीक मानकीकरण हुंछ। कुमाउनी यदि ऐलक बखत में संगठित नैं होलि तो यह सिरफ गौं-घरकि, फसक-फरावकि भाषा बणि बेर रै जालि।

• सांस्कृतिक आत्म-सम्मानक लिजी- 
जब भाषा मानकीकृत हैंछ, तो उमें साहित्य, कविता, नाटक, समाचार, रेडियो और तकनीकी लेखन सरल हुछ। यैल समाजकि सांस्कृतिक पछयाण और गौरवबोध बढूं।

इस्कूली पढ़ाई लिजी-
मानकीकरणल भाषा कैं इस्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करण संभव बणि जा्ल। इस्कूलों में कुमाउनी कैं पढ़न-पढून में तबै आसानी होलि जब वीक लिजी पाठ्यपुस्तक, व्याकरण और शिक्षण सामग्री मानकीकृत रूप में बणी हो।

सरकारी मान्यता लिजी-
संविधानकि अठूं अनुसूची में शामिल हुणै लिजी भाषाक  मानकीकरण, साहित्यिक बिकास और ठुल प्रयोक्ता समुदाय जरूड़ी छु। यास लाप कुमाउनी कैं राष्ट्रीय मंच में मान दिलै सकनी।

डिजिटल युग में उपयोगै लिजी-

कंप्यूटर, मोबाइल ऐप, अनुवाद उपकरण, एआई आदि में कुमाउनी तबै उपयोगी बणि सकलि जब वीक वर्तनी, शब्द और व्याकरण मानकीकृत हो।

          कुमाउनीक सबै उप बोलियों कैं सम्मान देते हुए एक साझा भाषाई रूप विकसित करी जौ। विद्वान, साहित्यकार और स्थानीय संस्थाओंक सहयोगल शब्दकोश, व्याकरण, वर्तनी मानक, पाठ्यपुस्तक तय्यार हो। हमरि राज्य सरकार और स्थानीय निकाय यकैं शिक्षा और प्रशासन में प्रयोग में ल्याओ।
               कुमाउनी भाषा सिरफ एक दुख-सुख लगूण और फसक-फरालकि माध्यम न्हैं, बल्की एक सांस्कृतिक चेतना छु। वीक मानकीकरण नैं सिरफ भाषा कैं बचाल वीक बिकास करल, बल्की कुमाउनी समाजकि सांस्कृतिक, बौद्धिक और राजनीतिक पछयाण कैं लै सशक्त करल। अगर यो बुति आज नैं करी गोय, तो औणी वालि पीढ़ी सिरफ  "हमार पुर्ख कभै कुमाउनी बुलांछी” कै बेर एक ज्यून भाषा कैं इतिहास बणै देलि।


य हम सबनकि संजैती जिमवारी छु कि आपणि दुदबोलि (मातृभाषा) कुमाउनी कैं एक सम्मानित, संगठित और समपन भाषाक रूप में बिकसित करो।
•••
( लेखक 'पहरू' कुमाउनी मासिक पत्रिका में उप संपादक हैं। ) 
tulera.lalit@gmail.com

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आगामी 10, 11 व 12 नवंबर को तीन दिवसीय राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन

कुमाऊं में प्रचलित होली संग्रह का विमोचन

हल्द्वानी में कुमाउनी भाषा का 14 वां राष्ट्रीय सम्मेलन

किताब समीक्षा : कुमाउनी शब्दों पर दो किताब - ललित तुलेरा

कुमाउनी पत्रकारिता का इतिहास History of kumauni journalism

कुमाउनी भाषा में इस वर्ष आयोजित आठ लेखन पुरस्कार योजनाएं

'उज्याव' संगठनल उरया सतूं औनलाइन कुमाउनी युवा कवि गोष्ठी